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दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई कार्ड्स को ₹15,000 के अनधिकृत कार्ड शुल्क 7% ब्याज के साथ लौटाने का आदेश दिया

दिल्ली के एक ज़िला उपभोक्ता आयोग ने एसबीआई कार्ड्स को ₹10,000 और ₹5,000 के दो अनधिकृत क्रेडिट कार्ड शुल्कों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया और 6 जुलाई 2017 के आरबीआई सर्कुलर के आधार पर 7% ब्याज के साथ रिफ़ंड और ₹10,000 मुआवज़े का आदेश दिया।

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दिल्ली के एक ज़िला उपभोक्ता आयोग ने क्रेडिट कार्ड जारीकर्ता एसबीआई कार्ड्स एंड पेमेंट सर्विसेज़ प्राइवेट लिमिटेड (एसबीआई कार्ड्स) को दो ऐसे शुल्कों के लिए ज़िम्मेदार ठहराया है, जिन्हें कार्डधारक ने अनधिकृत बताया। 21 सितंबर 2026 के आदेश में, जिसे लाइवलॉ ने 6 अक्टूबर को रिपोर्ट किया, आयोग ने कंपनी को ₹15,000 का रिफ़ंड 7% वार्षिक ब्याज के साथ लौटाने और ₹10,000 मुआवज़े के रूप में देने का निर्देश दिया। आयोग ने 6 जुलाई 2017 के आरबीआई सर्कुलर का सहारा लिया, जो अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों पर डाली जा सकने वाली ज़िम्मेदारी की सीमा तय करता है।

आदेश में क्या कहा गया है

शिकायत एक कार्डधारक ने उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 की धारा 35 के तहत डिस्ट्रिक्ट कंज़्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन-I (नॉर्थ डिस्ट्रिक्ट), दिल्ली में दर्ज की थी। उपभोक्ता आयोग अदालत जैसी संस्था है, जो सेवा में कमी की शिकायतें सुनती है।

आदेश के अनुसार, 23 मई 2024 को कार्डधारक ने एक विज्ञापन देखकर किसी ऐप पर ख़रीदारी शुरू की। इसी दौरान कार्डधारक के कार्ड पर ₹10,000 और ₹5,000 के शुल्क लग गए। कार्डधारक ने उसी दिन एसबीआई कार्ड्स को बताया और कार्डधारक के अनुरोध पर कार्ड ब्लॉक कर दिया गया। इसके बाद 28 मई 2024 को साइबर-अपराध की शिकायत दर्ज की गई। कार्डधारक का कहना था कि बार-बार अनुरोध के बावजूद एसबीआई कार्ड्स ने चार्जबैक (विवादित कार्ड भुगतान को पलटने की प्रक्रिया) आगे नहीं बढ़ाया और कोई जाँच पूरी नहीं की।

शिकायत में ₹15,000 की राशि 18% ब्याज के साथ और ₹2,00,000 मुआवज़े की माँग की गई थी। आयोग ने ये राशियाँ मंज़ूर नहीं कीं।

आयोग ने एसबीआई कार्ड्स को ज़िम्मेदार क्यों ठहराया

  • सबूत का भार। आयोग ने आरबीआई सर्कुलर (ग्राहक संरक्षण - अनधिकृत इलेक्ट्रॉनिक बैंकिंग लेनदेन में ग्राहकों की देनदारी की सीमा) का हवाला देते हुए कहा कि ग्राहक को सिर्फ़ उसी नुक़सान के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है जो उसकी अपनी लापरवाही से हुआ हो, और इसे साबित करने की पूरी ज़िम्मेदारी बैंक पर है। आयोग ने पाया कि एसबीआई कार्ड्स ने यह भार नहीं निभाया।
  • तुरंत सूचना। आयोग ने ध्यान दिलाया कि सर्कुलर के अनुसार, जब अनधिकृत लेनदेन किसी तीसरे पक्ष की चूक से होता है और ग्राहक तीन कार्य दिवसों के भीतर बैंक को बताता है, तो ग्राहक की देनदारी शून्य होती है। आयोग ने पाया कि शिकायतकर्ता ने लेनदेन के दिन ही सूचना दी। आयोग ने यह भी कहा कि इसका कोई सबूत नहीं था कि शिकायतकर्ता ने ओटीपी या भुगतान संबंधी गोपनीय विवरण किसी के साथ साझा किए थे।
  • अस्थायी क्रेडिट। आयोग ने कहा कि सर्कुलर का पैराग्राफ़ 9 बैंक से अपेक्षा करता है कि सूचना मिलने के 10 कार्य दिवसों के भीतर, जाँच ख़त्म होने का इंतज़ार किए बिना, विवादित राशि ग्राहक के खाते में जमा कर दी जाए। आयोग ने पाया कि एसबीआई कार्ड्स ने उस अवधि में, “या उसके बाद कभी भी” यह राशि जमा नहीं की।
  • 90 दिन की सीमा। आयोग ने कहा कि पैराग्राफ़ 10 के अनुसार बैंक को शिकायत का निपटारा अपनी बोर्ड-अनुमोदित नीति में तय समय के भीतर, और किसी भी हाल में 90 दिनों से अधिक नहीं, करना होता है, और एसबीआई कार्ड्स ने ऐसा नहीं किया।
  • रिकॉर्ड पर कोई लिखित जवाब नहीं। एसबीआई कार्ड्स ने अधिनियम की धारा 38(2)(a) में तय अवधि के भीतर अपना लिखित पक्ष दाख़िल नहीं किया। उसका बाद में दिया गया जवाब 45 दिन की वैधानिक अवधि बीतने के बाद दाख़िल हुआ और उसे रिकॉर्ड पर नहीं लिया गया।

आयोग ने क्या निर्देश दिए

निर्देश विवरण
रिफ़ंड ₹15,000, लेनदेन की तारीख़ से 7% वार्षिक ब्याज के साथ
मुआवज़ा उत्पीड़न और मानसिक पीड़ा के लिए ₹10,000
दिया गया समय आदेश मिलने से चार सप्ताह
समय पर भुगतान न होने पर चार सप्ताह पूरे होने से पूरी दी गई राशि पर 9% वार्षिक ब्याज

यह आदेश एक ज़िला-स्तरीय आयोग का एक अकेली शिकायत पर दिया गया फ़ैसला है। स्रोत यह नहीं बताते कि एसबीआई कार्ड्स ने अपील की है या आदेश पर कोई प्रतिक्रिया दी है।

इन आँकड़ों का आधार

सभी राशियाँ, तारीख़ें, पैराग्राफ़ संदर्भ और निर्देश आयोग के उपभोक्ता शिकायत संख्या DC/80/CC/370/2024 में आदेश से लिए गए हैं, जो 21 सितंबर 2026 का है। रिपोर्टिंग की तारीख़ और मामले के शीर्षक की लाइवलॉ और लॉचक्र से मिलान कर पुष्टि की गई। आरबीआई सर्कुलर का विवरण वैसा ही है जैसा आदेश में बताया गया है; पूरे पाठ के लिए सर्कुलर स्वयं पढ़ें।